Saraikela Road Issues: सड़क के अभाव में खटिया बनी सहारा

Saraikela Road Issues: सड़क के अभाव में खटिया बनी सहारा

झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के गेंगेरदा गांव में सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों ने बीमार महिला को खटिया पर लादकर 2 किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक पहुंचाया। घटना ने ग्रामीण इलाकों की बदहाल सड़क और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।

Jharkhand के Saraikela-Kharsawan जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने ग्रामीण इलाकों की बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। चांडिल प्रखंड के गेंगेरदा गांव में सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों को एक बीमार महिला को खटिया पर लादकर करीब दो किलोमीटर तक पैदल ले जाना पड़ा।

बीमार महिला को खटिया पर ले गए ग्रामीण

जानकारी के अनुसार, गांव की रहने वाली 55 वर्षीय बाजार देवी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। गांव तक पक्की सड़क नहीं होने की वजह से एंबुलेंस वहां तक नहीं पहुंच सकी। ऐसे में परिजनों और ग्रामीणों ने मिलकर खटिया को अस्थायी स्ट्रेचर बनाया और महिला को उबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए मुख्य सड़क तक पहुंचाया।

ग्रामीणों ने बताया कि गांव से मुख्य सड़क मातकोमटोड़ाग तक पहुंचने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। इसके बाद निजी वाहन की मदद से महिला को इलाज के लिए MGM Hospital ले जाया गया।

बरसात में और बढ़ जाती है परेशानी

स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के दिनों में गांव की स्थिति और अधिक खराब हो जाती है। कीचड़ और खराब रास्तों की वजह से पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। कई बार गंभीर मरीजों को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा पाता, जिससे उनकी जान तक खतरे में पड़ जाती है।

ग्रामीणों में नाराजगी

गेंगेरदा गांव के लोगों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी जताई है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से सड़क निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिले हैं।

लोगों का आरोप है कि बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण गांव के लोगों को आज भी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। यह घटना राज्य के दूरदराज इलाकों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर करती है।

विकास के दावों पर उठे सवाल

राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के बावजूद कई ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी मूलभूत सुविधाएं अब भी अधूरी हैं। गेंगेरदा गांव की यह घटना एक बार फिर विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को सामने लाती है।

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