झारखंड सरकार ने 23 दिसंबर को PESA अधिनियम, 1996 के नियमों की अधिसूचना जारी की। लेकिन आदिवासी समाज में इसे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। क्या यह कानून वास्तव में ग्राम सभा को ताकत देता है या परंपरागत व्यवस्था को कमजोर करता है? पढ़िए पूरी रिपोर्ट।
झारखंड में PESA कानून लागू, लेकिन विवाद क्यों?
झारखंड सरकार द्वारा 23 दिसंबर को PESA पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के नियमों की अधिसूचना जारी की गई है। यह कानून भारत के संविधान के तहत बनाया गया है, जिसका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों यानी आदिवासी इलाकों में ग्राम सभा को अधिक अधिकार देना है।
PESA कानून वर्ष 1996 में बना था, लेकिन झारखंड में इसे करीब 25 साल तक लागू नहीं किया गया। सरकार का कहना है कि अब इसे लागू करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी थी।
हालांकि, कानून लागू होने के बाद आदिवासी समाज और सामाजिक संगठनों के बीच इसे लेकर कई सवाल और आशंकाएँ सामने आ रही हैं।
❓ PESA पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
कई लोगों का मानना है कि मौजूदा नियम आदिवासी समुदाय के हित में पूरी तरह नहीं हैं।
1. काग़ज़ पर अधिकार, ज़मीन पर नहीं
PESA कानून के अनुसार:
- गाँव की ग्राम सभा सर्वोच्च संस्था होगी
- ग्राम सभा की मंजूरी के बिना कोई बड़ा फैसला नहीं होगा
लेकिन आलोचकों का कहना है कि:
- ज़मीनी हकीकत में फैसले सरकार और अधिकारी लेते हैं
- ग्राम सभा की राय को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है
इसीलिए सवाल उठता है —
जब अधिकार वास्तव में मिल ही नहीं रहे, तो कानून का क्या फायदा?
2. परंपरागत आदिवासी व्यवस्था पर खतरा
आदिवासी समाज की अपनी परंपरागत शासन व्यवस्थाएँ रही हैं:
- मुंडा–मानकी
- परहा व्यवस्था
- माझी–परगना
PESA कानून इन व्यवस्थाओं को मान्यता तो देता है, लेकिन राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों में इनकी भूमिका सीमित हो जाती है।
इससे:
- पारंपरिक मुखियाओं की ताकत घट सकती है
- आदिवासी संस्कृति और पहचान को नुकसान पहुँचने की आशंका है
3. जल, जंगल और ज़मीन की चिंता
PESA कानून कहता है कि:
- जल, जंगल और ज़मीन पर ग्राम सभा का अधिकार होगा
लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि:
- खनन, फैक्ट्री और विकास परियोजनाओं के लिए ज़मीन अधिग्रहण जारी है
- कई बार ग्राम सभा की सहमति दबाव में ली जाती है
- CNT–SPT और वन अधिकार कानूनों की अनदेखी होती है
इसी वजह से लोगों को डर है कि कहीं PESA ज़मीन बचाने के बजाय ज़मीन छीनने का ज़रिया न बन जाए।
4. राज्य सरकारों के नियम PESA को कमजोर बनाते हैं
PESA एक केंद्रीय कानून है, लेकिन:
- इसे लागू करने के नियम राज्य सरकारें बनाती हैं
आलोचकों का कहना है कि कई राज्यों में:
- ग्राम सभा को सिर्फ़ “सलाह देने” तक सीमित कर दिया गया है
- अंतिम फैसला सरकार के पास रहता है
इससे PESA की मूल भावना और ताकत कमजोर पड़ जाती है।
5. नेतृत्व को लेकर विवाद
आदिवासी समाज में नेतृत्व परंपरागत रूप से समुदाय खुद तय करता है।
लेकिन PESA के तहत:
- राजनीतिक और सरकारी दखल बढ़ने की आशंका है
- पंचायत चुनावों से जुड़े लोग ग्राम सभा पर हावी हो सकते हैं
इससे गाँवों में:
- आपसी टकराव
- सामाजिक तनाव बढ़ने का खतरा है
🏛️ झारखंड सरकार का पक्ष
झारखंड सरकार का कहना है कि:
- PESA लागू करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य था
- इससे आदिवासी परंपराएँ सुरक्षित रहेंगी
- ग्राम सभा को निर्णय लेने में मजबूती मिलेगी
- सरकार संविधान और कानून के अनुसार ही काम करेगी
सरकार के मुताबिक लोगों को किसी भी प्रकार की चिंता करने की जरूरत नहीं है।

