अंश–अंशिका की सकुशल बरामदगी: राहत की खबर, लेकिन कई सवाल अब भी अनुत्तरित |

अंश–अंशिका की सकुशल बरामदगी: राहत की खबर, लेकिन कई सवाल अब भी अनुत्तरित |

रांची।
बीते कई दिनों से झारखंड की जनता जिस दृश्य को देखकर व्यथित थी—एक घर, बिलखते माता-पिता, जलता दिया और टूटती उम्मीद—आज उसी कहानी में राहत की एक किरण जुड़ गई है। अपहृत बच्चे अंश और अंशिका को झारखंड पुलिस ने सकुशल बरामद कर लिया है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, दोनों बच्चों को रामगढ़ जिले के चितरपुर थाना क्षेत्र से बरामद किया गया। यह कार्रवाई सुबह के समय की गई, जहाँ बच्चों को एक महिला रौशनआरा के घर से सुरक्षित निकाला गया। महिला का दावा है कि जिन लोगों ने बच्चों का अपहरण किया था, वे उसके यहाँ किराए पर रह रहे थे।

कई सवाल, जिनके जवाब अभी बाकी

हालाँकि बच्चों की सुरक्षित वापसी से परिजनों ने राहत की साँस ली है, लेकिन इस मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि अपहरणकर्ता कौन थे, वे कहाँ के रहने वाले थे और बच्चों को अगवा करने के पीछे उनकी मंशा क्या थी।

क्या किसी बड़े अपहरण गिरोह से जुड़े हैं तार?

मामले को लेकर यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं यह घटना किसी संगठित अपहरण गिरोह से तो नहीं जुड़ी है। पुलिस इस एंगल से भी जांच कर रही है और जल्द ही पूरे मामले का खुलासा करने का दावा कर रही है।

पुलिस की सफलता या जनता का दबाव?

अंश और अंशिका की बरामदगी को झारखंड पुलिस की बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या यह कार्रवाई जनता, मीडिया और सामाजिक संगठनों के दबाव के बिना संभव हो पाती?

इस दौरान बच्चों के माता-पिता लगातार मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन न तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, न ही कल्पना सोरेन और न ही युवा विधायक टाइगर जयराम महतो की ओर से कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आई।

1046 अपहरण मामले और अधूरी तस्वीर

यदि इस एक मामले की सफलता पर ही संतोष कर लिया जाए, तो वास्तविक तस्वीर अधूरी रह जाती है। राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (SCRB) के अनुसार, पिछले वर्ष झारखंड में कुल 1046 अपहरण के मामले दर्ज किए गए। इनमें से कितने मामलों में बच्चे आज भी अपने परिवारों से नहीं मिल पाए हैं—इसका कोई स्पष्ट और सार्वजनिक उत्तर उपलब्ध नहीं है।

राहत के साथ जिम्मेदारी का सवाल

अंश और अंशिका की सकुशल वापसी निश्चित रूप से राहत की खबर है, लेकिन यह प्रश्न अब भी कायम है कि जो बच्चे आज तक अपने घर नहीं लौट पाए, उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

आगे की राह

यह मामला केवल दो बच्चों की बरामदगी तक सीमित नहीं है। यह अपहरण नेटवर्क, पुलिस की कार्यप्रणाली और सरकार की संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। आने वाले दिनों में जांच किस दिशा में जाती है और क्या इस मामले से कोई ठोस सुधार सामने आता है—इस पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हुई हैं।


✍️ Prachi Anand

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