झारखंड में 22 वर्षों के दौरान हजारों करोड़ रुपये के सरकारी खर्च का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है। ऑडिट रिपोर्ट में भारी वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हुआ है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
Jharkhand में सरकारी खर्च को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। बीते 22 वर्षों के दौरान राज्य के विभिन्न विभागों द्वारा किए गए करीब 9737 करोड़ रुपये के खर्च का कोई स्पष्ट हिसाब उपलब्ध नहीं है।
यह खुलासा राज्य सरकार के अंकेक्षण निदेशालय की रिपोर्ट में हुआ है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विकास कार्यों के नाम पर बिना प्रमाण खर्च
रिपोर्ट के अनुसार, विकास योजनाओं और अन्य मदों के लिए विभागों को भारी रकम जारी की गई, लेकिन इसके बदले जरूरी दस्तावेज जैसे बिल, कैश बुक और उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा नहीं किए गए।
इससे यह स्पष्ट होता है कि कई विभागों ने वित्तीय नियमों का पालन नहीं किया।
8000 करोड़ से ज्यादा खर्च पर दर्ज आपत्ति
ऑडिट विभाग ने लगभग 8330 करोड़ रुपये के खर्च पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की है। नियमों के तहत इन आपत्तियों का समय पर जवाब देना अनिवार्य था, लेकिन अधिकांश मामलों में विभागों ने कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दिया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि विभागीय उदासीनता के कारण वित्तीय अनुशासन कमजोर पड़ा है।
गबन और वसूली के मामले भी सामने आए
ऑडिट के दौरान लगभग 63 करोड़ रुपये के गबन के मामले सामने आए हैं। इसके अलावा, करीब 688 करोड़ रुपये की राशि ऐसी है, जिसकी वसूली अब तक नहीं हो सकी है।
यह राशि गलत तरीके से खर्च की गई थी, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो पाई।
एडवांस और गलत मद में खर्च की राशि
अलग-अलग विभागों ने करीब 476 करोड़ रुपये एडवांस के रूप में लिए थे, जिनका समायोजन नहीं किया गया।
इसके साथ ही, लगभग 180 करोड़ रुपये ऐसे मदों में खर्च हुए, जिनकी अनुमति नहीं थी। इसे ऑडिट विभाग ने गंभीर अनियमितता माना है।
वित्त विभाग की बैठक में हुआ खुलासा
यह मामला वित्त विभाग की बैठक के दौरान उजागर हुआ था। तत्कालीन वित्त मंत्री Rameshwar Oraon ने इसे गंभीर मानते हुए विशेष ऑडिट कराने का निर्देश दिया था।
स्पेशल ऑडिट के दौरान हजारों करोड़ की गड़बड़ी सामने आई, लेकिन रिपोर्ट के बाद भी स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ।
सचिवों की बैठकों के बाद भी नहीं हुई ठोस कार्रवाई
वर्ष 2022 और 2023 में सभी विभागों के सचिवों के साथ बैठकें आयोजित की गईं और ऑडिट आपत्तियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए।
इसके बावजूद, यह मामला लंबे समय तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। बाद में वर्तमान वित्त मंत्री ने फिर से समीक्षा की प्रक्रिया शुरू करने के संकेत दिए।
“10 हजार करोड़ का कोई अता-पता नहीं” – रामेश्वर उरांव
पूर्व वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि सरकार के करीब 10 हजार करोड़ रुपये का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है।
उन्होंने कहा था कि इतनी बड़ी राशि के मामले में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती और जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
ऑडिट विभाग की सीमाएं बनी बड़ी समस्या
ऑडिट विभाग केवल गड़बड़ियों की पहचान कर सकता है, लेकिन उसके पास कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। कार्रवाई की जिम्मेदारी संबंधित विभागों पर होती है, जहां कई बार मामले दबा दिए जाते हैं।
इसके अलावा, विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी भी एक बड़ी समस्या है। 250 से अधिक स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 20 से 22 ऑडिटर ही कार्यरत हैं।
वित्तीय अनुशासन पर गंभीर सवाल
9737 करोड़ रुपये के खर्च का हिसाब न होना झारखंड की वित्तीय व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक नियमित ऑडिट, पारदर्शिता और सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक इस तरह की अनियमितताओं पर रोक लगाना मुश्किल रहेगा।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह राशि हमेशा के लिए सरकारी खजाने से गायब मानी जा सकती है।

