Jharkhand Municipal Elections 2026 में वार्ड आरक्षण ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। कई निवर्तमान पार्षदों ने अपनी पत्नियों को उम्मीदवार बनाया, तो कई बड़े नेता चुनाव से दूर हो गए।
झारखंड में नगर निकाय चुनाव 2026 की तैयारियां तेज हो गई हैं। 23 फरवरी को मतदान और 27 फरवरी को मतगणना होनी है। लेकिन इस बार वार्डों के आरक्षण ने कई नेताओं की राजनीतिक रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है।
आरक्षण के कारण कई सामान्य सीटें महिला, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के लिए सुरक्षित कर दी गई हैं। इसका सीधा असर निवर्तमान पार्षदों पर पड़ा है, जिन्हें अब या तो दूसरे वार्ड से चुनाव लड़ना पड़ रहा है या फिर अपने परिवार के सदस्यों को मैदान में उतारना पड़ रहा है।
वार्ड 10 में पत्नियों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला
वार्ड संख्या 10 इस बार महिला के लिए आरक्षित किया गया है। पहले यह सामान्य वर्ग के लिए था। इसके चलते यहां तीन दिग्गज नेताओं की पत्नियां आमने-सामने हैं—
- संगीता देवी (पत्नी: अर्जुन यादव)
- सरस्वती महतो (पत्नी: श्रवण महतो)
- रंजू सिंह (पत्नी: अभय सिंह)
इस वार्ड में मुकाबला काफी दिलचस्प माना जा रहा है।
वार्ड 34 में तीन निवर्तमान पार्षद आमने-सामने
वार्ड संख्या 34 भी इस चुनाव में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यहां तीन वर्तमान और पूर्व पार्षद चुनावी मैदान में उतर चुके हैं—
- विनोद सिंह
- अरुण कुमार झा
- ओमप्रकाश
अन्य वार्डों के आरक्षित हो जाने के कारण इन नेताओं को वार्ड 34 से चुनाव लड़ना पड़ रहा है।
उप-महापौर संजीव विजयवर्गीय ने बनाई दूरी
आरक्षण का सबसे बड़ा असर उप-महापौर संजीव विजयवर्गीय पर पड़ा है। उनके पारंपरिक वार्ड इस बार महिला के लिए आरक्षित हो गए हैं। आसपास के अधिकांश वार्ड भी महिला आरक्षित होने के कारण उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है।
परिवार के भरोसे चुनावी मैदान
कई वार्डों में पति-पत्नी की अदला-बदली के जरिए उम्मीदवार उतारे गए हैं—
- वार्ड 35 (एसटी महिला): झरी लिंडा की पत्नी मैदान में
- वार्ड 42 (महिला अनारक्षित): कृष्णा महतो की पत्नी ममता देवी
- वार्ड 2: गोंदरा उरांव की पत्नी सरिता देवी
- वार्ड 13: पूनम देवी के पति प्रभुदयाल बड़ाइक
इससे साफ है कि आरक्षण के चलते परिवार आधारित राजनीति को बढ़ावा मिला है।
बदला हुआ चुनावी परिदृश्य
नगर निकाय चुनाव 2026 में आरक्षण ने परंपरागत राजनीतिक समीकरणों को तोड़ दिया है। कई दिग्गज नेता या तो दूसरे वार्ड में शिफ्ट हुए हैं या फिर अपने करीबी रिश्तेदारों को टिकट दिला रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव का असर चुनावी नतीजों पर साफ नजर आएगा।
निष्कर्ष
झारखंड नगर निकाय चुनाव 2026 में आरक्षण इस बार सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। जहां कई पुराने चेहरे मैदान से बाहर हो गए हैं, वहीं नई रणनीतियों के जरिए राजनीतिक रसूख बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता किसे अपना समर्थन देते हैं।

