झारखंड के पलामू जिले में बीती देर रात हुई मुठभेड़ ने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया। मनातू थाना क्षेत्र के केदल गांव के पास पुलिस और नक्सलियों के बीच चली इस भीषण गोलीबारी में झारखंड पुलिस के दो जवान शहीद हो गए। जबकि एक जवान गंभीर रूप से घायल है, जिसका इलाज मेदिनीनगर स्थित एमएमसीएच (MMCH) में चल रहा है।
यह मुठभेड़ भले ही करीब पंद्रह मिनट तक चली हो, लेकिन उस छोटे से समय में ही दो परिवारों के सपने टूट गए और पूरे इलाके में मातम का माहौल छा गया। शहादत की खबर जब जवानों के गांव पहुँची तो पूरे इलाक़े में सन्नाटा पसर गया।

शहीद जवानों के गांव में पसरा मातम
शहादत देने वाले जवानों में एक का नाम सान्तन मेहता है, जो हैदरनगर के बरेवा गांव के रहने वाले थे। वहीं, दूसरे शहीद जवान सुनील राम का घर परता गांव में है। दोनों ही जवानों के घरों में मातम पसरा हुआ है। गाँव की गलियों से लेकर चौक-चौराहों तक लोग गमगीन हैं।
गाँव के बुजुर्ग, महिलाएँ और बच्चे—सबकी आँखें नम हैं। लेकिन शहीद के परिजनों और गाँववालों के चेहरे पर अपने लाल की वीरता और देशभक्ति पर गर्व भी साफ झलक रहा है। हर कोई यही कह रहा है कि उन्होंने अपनी जान देकर न केवल गाँव का नाम रोशन किया है, बल्कि पूरे पलामू का मान बढ़ाया है।
मुठभेड़ की पूरी कहानी
पलामू के डीआईजी नौशाद आलम ने बताया कि पुलिस की टीम सर्च ऑपरेशन पर निकली हुई थी। खुफिया जानकारी मिली थी कि TSPC (तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी) का टॉप कमांडर शशिकांत अपने दस्ते के साथ केदल गांव के पास सक्रिय है। इसके बाद पुलिस और सुरक्षा बलों की टीम इलाके में सघन अभियान चला रही थी।

रात का अंधेरा और जंगलों की कठिन भौगोलिक स्थिति नक्सलियों के लिए हमेशा से ही फायदेमंद रही है। पुलिस टीम जैसे ही उस इलाके में पहुँची, अचानक नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने भी मोर्चा संभाला और करीब पंद्रह मिनट तक दोनों ओर से जोरदार मुठभेड़ होती रही।
इस दौरान गोलीबारी में दो जवानों ने वीरगति पाई, जबकि एक जवान गंभीर रूप से घायल हो गया। इसके बाद नक्सली जंगल का फायदा उठाकर भाग निकले। पुलिस ने इलाके की घेराबंदी की और सर्च अभियान अभी भी जारी है।
घायल जवान का इलाज जारी
घायल जवान को तत्काल मेदिनीनगर के MMCH अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों की टीम उसका इलाज कर रही है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि घायल जवान की स्थिति नाजुक है, लेकिन पूरी कोशिश की जा रही है कि उसे बचाया जा सके।
नक्सली गतिविधियों से जूझता पलामू
पलामू और उसके आसपास का इलाका लंबे समय से नक्सली गतिविधियों का गढ़ माना जाता है। खासकर मनातू, हैदरनगर, छतरपुर और पांकी जैसे इलाक़े हमेशा से पुलिस और नक्सलियों के बीच संघर्ष का मैदान बने रहे हैं।
TSPC संगठन, जो CPI (माओवादी) से अलग होकर बना था, अब भी पलामू, गढ़वा और लातेहार जैसे जिलों में सक्रिय है। इनके कमांडर शशिकांत का नाम पुलिस रिकॉर्ड में लंबे समय से दर्ज है। उस पर कई मामले दर्ज हैं और पुलिस लंबे समय से उसकी तलाश में है।
DIG का बयान
पलामू रेंज के डीआईजी नौशाद आलम ने बताया—
“पुलिस लगातार इलाके में अभियान चला रही है। हमें सूचना मिली थी कि TSPC का दस्ता सक्रिय है। उसी सूचना के आधार पर हमारी टीम आगे बढ़ी थी, तभी मुठभेड़ हुई। इसमें हमारे दो जवान शहीद हो गए और एक गंभीर रूप से घायल है। नक्सली अंधेरे का फायदा उठाकर भाग निकले। फिलहाल इलाके में सर्च अभियान जारी है और अतिरिक्त बल भी भेजा गया है।”
गांववालों की प्रतिक्रिया
जब शहीद जवानों के घरों में खबर पहुँची, तो मातम पसर गया। लेकिन लोगों के दिलों में गर्व भी कम नहीं था।
बरेवा गांव के बुजुर्गों ने कहा, “हमारा बेटा देश की रक्षा करते हुए शहीद हुआ है। उसकी शहादत बेकार नहीं जाएगी।”
परता गांव की महिलाएँ बिलख-बिलख कर रो रही थीं। लेकिन साथ ही हर कोई यही कह रहा था कि “सुनील ने पूरे गांव का नाम रोशन कर दिया।”
गाँव के युवाओं में गुस्सा साफ झलक रहा है। उनका कहना है कि नक्सलवाद अब खत्म होना चाहिए और सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।
शहादत की कीमत
हर शहीद जवान की शहादत न केवल परिवार के लिए गहरा आघात होती है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक बड़ा संदेश भी छोड़ जाती है। झारखंड के इन वीर सपूतों ने यह साबित किया कि देश की सुरक्षा और आम नागरिकों की जान की हिफाजत के लिए वे अपनी जान की बाज़ी लगाने से भी पीछे नहीं हटते।
नक्सलियों पर बढ़ता दबाव
झारखंड पुलिस और सुरक्षा बल पिछले कुछ वर्षों से लगातार अभियान चला रहे हैं। कई नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं और कई मारे भी गए हैं। लेकिन कुछ टॉप कमांडर अब भी सक्रिय हैं, जिनके खिलाफ लगातार अभियान चल रहा है।
यह मुठभेड़ इस बात का संकेत है कि सुरक्षा बल नक्सलियों के खिलाफ लगातार दबाव बनाए हुए हैं। हालांकि, जवानों की शहादत यह भी दिखाती है कि अभी भी यह लड़ाई आसान नहीं है।
सरकार और प्रशासन की चुनौती
शहीदों की शहादत से एक बार फिर सवाल उठता है कि आखिर कब तक झारखंड नक्सली हिंसा की आग में झुलसता रहेगा? सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—
नक्सलियों का खात्मा करना
युवाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना

ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाएँ पहुँचाना
जब तक नक्सल प्रभावित इलाकों में शिक्षा, रोजगार और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं पहुँचेंगी, तब तक नक्सलवाद की जड़ें पूरी तरह से खत्म करना मुश्किल होगा।
शहीदों को सलाम
आज पूरा झारखंड अपने इन वीर सपूतों को सलाम कर रहा है। चाहे बरेवा गांव हो या परता गांव—हर जगह लोगों की भीगी आँखें और गर्व से भरा दिल यह संदेश दे रहे हैं कि देश के जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।
निष्कर्ष
पलामू की इस मुठभेड़ ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि नक्सली समस्या आज भी झारखंड के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। दो जवानों की शहादत हमें याद दिलाती है कि हमारी सुरक्षा बल हर दिन, हर पल अपने जीवन को दांव पर लगाकर हमारे लिए लड़ रहे हैं।
सान्तन मेहता और सुनील राम की शहादत केवल उनके परिवार की नहीं, बल्कि पूरे झारखंड और भारत की शहादत है। उनकी याद हमेशा दिलों में जिंदा रहेगी और उनकी वीरगाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनकर रहेगी।

