झारखंड की पुलिस इन दिनों लगातार विवादों में घिरी हुई है। हाल ही में पतरातू से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां मीट दुकान चलाने वाले राजेश साव को कथित रूप से पुलिस अधिकारियों को मुफ्त में मीट न देने की वजह से झूठे आर्म्स एक्ट के केस में फंसा कर जेल भेज दिया गया। राजेश साव की पत्नी का आरोप है कि उनके पति को फोन कर थाने बुलाया गया और फिर उन्हें झूठे केस में फंसा दिया गया, जबकि पुलिस का दावा है कि राजेश रात में किसी ‘योजना’ की तैयारी कर रहे थे। इस विरोधाभास ने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस मामले को लेकर X (ट्विटर) पर तीखी प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने कहा कि “झारखंड में कुछ पुलिस अधिकारी कानून को निजी रंजिश निकालने का हथियार बना चुके हैं।” मरांडी ने उच्च न्यायालय से मांग की है कि पिछले छह वर्षों में दर्ज सभी आर्म्स एक्ट, NDPS, राजद्रोह और SC/ST एक्ट के मामलों की समीक्षा की जाए ताकि फर्जी मुकदमों की सच्चाई सामने आ सके। यह मामला न केवल झारखंड पुलिस की छवि पर सवाल उठाता है, बल्कि राज्य में कानून और इंसाफ की स्थिति पर भी गहरा चिंतन करने को मजबूर करता है।

